Reg No. 04/19/01/18414/16

क़माल मौला मस्जिद मुक़दमा:
हालिया अदालती फ़ैसले ने तारीख़, इंसाफ़ और भारतीय सेक्युलरिज़्म के प्रति भरोसे को ख़त्म कर दिया

मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर धार में स्थित क़माल मौला मस्जिद, जिसे आज “भोजशाला विवाद” के नाम से पेश किया जा रहा है, महज़ एक इमारत या इबादतगाह का मसला नहीं बल्कि भारत में ऐतिहासिक विरसे, आइनी मुसावात और मज़हबी आज़ादी के मुस्तक़बिल से जुड़ा हुआ एक निहायत हस्सास मामला बन चुका है और रहेगा। हालिया अदालती फ़ैसले के बाद यह मसला एक बार फिर क़ौमी बहस का विषय है और मुल्क के करोड़ों अमन पसंद इंसानों में तश्वीश और ग़म का माहौल है।
इस्लामी तालीमात और फ़िक़्ही उसूलों के मुताबिक जब कोई जगह एक मर्तबा मस्जिद के तौर पर वक़्फ़ कर दी जाती है तो वह महज़ एक इमारत या ज़मीन का टुकड़ा नहीं रहती बल्कि “वक़्फ़-ए-इलाही” बन जाती है। शरीअत की रौ से ऐसी ज़मीन हमेशा के लिए अल्लाह के नाम मख़सूस हो जाती है, जिसे न फ़रोख़्त किया जा सकता है, न मुन्तक़िल किया जा सकता है और न ही उसकी मज़हबी हैसियत तब्दील की जा सकती है। इसलिए यह कहना कि मुसलमान इस जगह को छोड़कर कहीं और मस्जिद तामीर कर लें, मुसलमानों के जज़्बात के साथ खिलवाड़ करने के साथ-साथ शरई हुक्म की ख़िलाफ़वर्ज़ी भी है। सदियों तक जहाँ अज़ान गूँजती रही हो, नमाज़ अदा होती रही हो और जिसे उम्मत-ए-मुस्लिमह ने मस्जिद की हैसियत से क़बूल किया हो, उसकी पहचान महज़ इंतिज़ामी या सियासी फ़ैसलों से ख़त्म नहीं की जा सकती। यही वजह है कि मुसलमान क़माल मौला मस्जिद के मसले को सिर्फ़ एक ऐतिहासिक विवाद नहीं बल्कि अपने दीनी विरसे, मज़हबी हक़ और वक़्फ़ की शरई हैसियत से जुड़ा हुआ मामला समझते हैं।
क़माल मौला मस्जिद की तारीख़ सदियों पर मुहीत है। ऐतिहासिक रिवायतों और मुख़्तलिफ़ हवाले के मुताबिक यह मस्जिद सल्तनत-ए-दिल्ली के दौर में मालवा की फ़तह के बाद तामीर की गई और बाद के दौर में इसकी मरम्मत और तौसीअ भी होती रही। इस मस्जिद की तामीर और फ़न-ए-तामीर, मेहराब, दालान, सहन, हौज़ और दीगर आसार को देखते हुए यह बात वाज़ेह है कि यह एक मुनज़्ज़म इस्लामी इबादतगाह थी। कई सदियों तक यहाँ नमाज़ अदा होती रही और यह इलाक़े के दीनी व समाजी मरकज़ के तौर पर पहचानी जाती रही और यह मस्जिद इबादतगाह मालवा की पहचान बनी।
बाद के ज़माने में कुछ हल्क़ों की जानिब से यह दावा किया गया कि यह मक़ाम दरअसल क़दीम “सरस्वती मंदिर” या “संस्कृत पाठशाला” था जिसे बाद में मस्जिद में तब्दील किया गया। लेकिन इस दावे के हक़ में ऐसा कोई ऐतिहासिक सुबूत सामने नहीं आ सका जिसकी बुनियाद पर सदियों से क़ायम मज़हबी पहचान को मुकम्मल तौर पर तब्दील कर दिया जाए। कई मोर्रिख़ीन ने भी इस दावे को बहुत ही साफ़-साफ़ अल्फ़ाज़ में कमज़ोर और क़यास आराई पर मबनी क़रार दिया है। यही वजह है कि तवील अरसे तक इस मक़ाम को एक मुतनाज़ा मगर मुश्तरका इंतिज़ामी निज़ाम के तहत चलाया जाता रहा, जहाँ मुसलमानों को जुमे की नमाज़ की इजाज़त हासिल थी।
हालिया अदालती फ़ैसले ने इसी तवाज़ुन को बदल दिया है। अदालत ने न सिर्फ़ मुसलमानों की नमाज़ की इजाज़त ख़त्म की बल्कि इस मक़ाम को बाक़ायदा तौर पर मंदिर क़रार देते हुए हिंदू इबादत के लिए खोल दिया, जो कि संविधान की रूह के ख़िलाफ़ है। अदालत इस तरह के फ़ैसले एक मख़सूस तबक़े को ख़ुश करने के लिए दे रही है। यह फ़ैसला मुस्लिम हल्क़ों में इस एहसास को और गहरा कर रहा है कि मुल्क में ऐतिहासिक मसाजिद की मज़हबी हैसियत को मुसलसल चैलेंज किया जा रहा है। बाबरी मस्जिद के बाद इस नौइयत के फ़ैसलों ने एक बड़े तबक़े के ज़ेहन में यह सवाल पैदा कर दिया है कि अगर किसी मक़ाम पर सदियों तक नमाज़ अदा होती रही हो, इस्लामी आसार मौजूद हों और उसे ऐतिहासिक इस्लामी विरसे के तौर पर तस्लीम किया जाता रहा हो, तो फिर उसकी पहचान को किस बुनियाद पर तब्दील किया जा सकता है?
अफ़सोस की बात यह है कि आज कुछ गोदी मीडिया चैनल्स और कुछ अख़बार इस मामले में एकतरफ़ा, ग़ैर-मुसद्दक़ा और ग़ैर-मुनसिफ़ाना मालूमात पेश कर रहे हैं। हालाँकि ऐतिहासिक हवाले, क़दीम दस्तावेज़ात और सदियों तक वहाँ नमाज़ की अदायगी जैसे वाज़ेह शवाहिद इस मक़ाम के मस्जिद होने की गवाही देते हैं, लेकिन इसके बावजूद कुछ हल्क़े मख़सूस बयानिया क़ायम करने के लिए बेबुनियाद दावों और जज़्बाती प्रोपेगैंडा का सहारा ले रहे हैं। ज़िम्मेदार सहाफ़त का तक़ाज़ा यह है कि ऐसे हस्सास मामलों में हक़ायक़, तारीख़ और ग़ैर-जानिबदारी को तरजीह दी जाए, न कि सनसनी और तअस्सुब को।
तारीख़ में इससे पहले भी कई ऐसे वाक़ियात पेश आ चुके हैं जहाँ “आस्था” और अक्सरियती दावों को बुनियाद बनाकर ऐतिहासिक मसाजिद की हैसियत को चैलेंज किया गया। बाबरी मस्जिद, अयोध्या इसकी सबसे बड़ी मिसाल है, जिसे सदियों तक मस्जिद माने जाने के बावजूद एक तवील विवाद के बाद मुनहदिम कर दिया गया। इन मामलों ने मुसलमानों में यह तश्वीश पैदा की है कि अगर ऐतिहासिक शवाहिद, मज़हबी आज़ादी और आइनी तहफ़्फ़ुज़ात के बजाय सिर्फ़ अकीदत और अक्सरियती एहसासात को बुनियाद बनाया जाता रहा तो अक़लियतों को कभी इंसाफ़ नहीं मिलेगा। मेजॉरिटी टेररिज़्म को बढ़ावा मिलेगा और इस तरह मुल्क तबाह हो जाएगा। मुल्क की कई ऐतिहासिक मसाजिद विवाद का शिकार होती रहेंगी। यही पस-ए-मंज़र क़माल मौला मस्जिद के मामले को भी मुसलमानों के नज़दीक निहायत हस्सास और अपने मज़हबी व तहज़ीबी वजूद से जुड़ा हुआ मसला बना देता है।
यहाँ अस्ल मसला सिर्फ़ एक मुक़दमा नहीं बल्कि इंसाफ़ के उसूल का है। भारत का संविधान तमाम मज़ाहिब के मानने वालों को बराबर हुक़ूक़ देता है। अगर ऐतिहासिक विवादों को सिर्फ़ अक्सरियती जज़्बात (आस्था) की बुनियाद पर हल किया जाने लगे तो फिर मुल्क की सेक्युलर रूह कमज़ोर पड़ सकती है। अदालतों से हमेशा यह तवक़्क़ो की जाती है कि वह तारीख़, शवाहिद और आइनी अक़दार की रौशनी में ऐसे फ़ैसले दें जो मुल्क में एतमाद, हमआहंगी और इंसाफ़ को मज़बूत करें।
यह हक़ीक़त भी नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती कि भारत की तहज़ीब मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब, साक़ाफ़तों और ऐतिहासिक रिवायतों के इश्तिराक से बनी है। मसाजिद, मंदिरों, गिरजाघरों और दीगर ऐतिहासिक मक़ामात को महज़ विवाद की अलामत बनाने के बजाय मुश्तरका विरसे के तौर पर देखा जाना चाहिए। अगर हर ऐतिहासिक मक़ाम को नए सिरे से मज़हबी ऐनक और आस्था के झूठे प्रोपेगैंडा की नज़र से देखा जाएगा तो इससे समाज में बेएतमादी और कशीदगी बढ़ेगी और भारत का समाजी ताना-बाना हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगा, जो इस तरह के फ़ैसलों से होता जा रहा है।
मुस्लिम फ़रीक़ ने इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज करने का एलान किया है, लेकिन तब तक वहाँ पूजा-पाठ नहीं होना चाहिए जब तक सुप्रीम कोर्ट का हत्मी फ़ैसला नहीं आ जाता, और उम्मीद की जा रही है कि आला अदालत इस मामले का जायज़ा ऐतिहासिक हक़ायक़, आइनी उसूलों और मज़हबी आज़ादी के तनाज़ुर में लेगी। भारत जैसे कसीर-मज़हबी मुल्क में यही रास्ता अमन, इंसाफ़ और बाहमी एतमाद को बरक़रार रख सकता है।
आज ज़रूरत इस बात की है कि इस मसले को इश्तिआल, नफ़रत और सियासी फ़ायदे के बजाय ऐतिहासिक दियानतदारी और आइनी इंसाफ़ के साथ देखा जाए। क्योंकि इबादतगाहें सिर्फ़ पत्थरों की इमारतें नहीं होतीं, वह क़ौमों की याददाश्त, अकीदत और तहज़ीबी पहचान का हिस्सा भी होती हैं। आज हुकूमत तमाम हुक्म आस्था की बुनियाद पर दे रही है, जो कि ग़लत है।

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